सीबीआई ने छीना लालू के परिवार का चैन

सीबीआई ने छीना लालू के परिवार का चैन
Updated 22:12 07 Sat Oct 2017
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बिहार की राजनीति को एक अलग रूख देने वाले लालू प्रसाद यादव के रसूख से देश का लगभग हर शख्स वाकिफ है। बिहार की राजनीति में लालू को लेकर जो खौफ उस वक्त था वक्त के साथ शायद वो खत्म या कम हो गया लेकिन बेबाक बयान देने वाली उनकी आदत न तो सत्ता के रसूख के कारण है और न ही अन्य खास वजहों से। सत्ता पर काबिज रहते हुए भी लालू यादव विपक्ष पर जमकर हमला बोलते थे और सत्ता से हटने के बाद भी विरोधियों पर निशाना साधने में देर नहीं करते। बिहार में तख्तापलट हो तो लालू की रडार पर नीतीश कुमार होते हैं और विकास के मुद्दे पर पीएम मोदी। कई बार उनकी यही बेबाक जुबान उन्हें कठघरे में लाकर खड़ा कर देती है। इन दिनों लालू और उनके परिवार पर सीबीआई द्वारा जो कार्रवाई की जा रही है, शायद ये उसी बेबाक जुबान के कारण है। पीएम मोदी के खिलाफ बयान देने के बाद लालू कठघरे में ही खड़े नजर आ रहे हैं। लालू पर सीबीआई का शिकंजा कसना लाजिमी है, क्योंकि बिहार की सत्ता में रहते हुए उन्होंने न सिर्फ विकास के उद्देश्य से दी गए पैसे का गड़बड़झाला किया, बल्कि विकास का पैसा पानी की तरह भी बहाया और विकास से ही कोसों दूर रहे।

सिर्फ लालू ही क्यों, आजादी के सात दशकों के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखा जाए तो ज्यादातर नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। मगर 70 सालों के इतिहास में किसी भी राजनेता के खिलाफ इतनी शिद्दत से कार्रवाई नहीं की गई, जितनी लालू के खिलाफ की जा रही है। चाहे वो उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती हों, मुलायम सिंह यादव हों या फिर कांग्रेस को भ्रष्टाचार की गंगोत्री बताने वाले भाजपा नेता। सभी की आय में दिन-दुगुनी रात चौगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन उन पर कार्रवाई कब, किस तरह से की जा रही है, इसकी भनक तक किसी को नहीं लगी। मोदी के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस खुद की लाज बचाने के लिए बेतूका तर्क देती आई है। कानूनी कमजोरियों की आड़ ली जा रही है, सबूत के अभाव अपने बचाव की ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये सभी तर्क लालू यादव के मामले की तरफ और भी ज्यादा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, क्योंकि एक वही हैं, जिन पर पीएम मोदी के खिलाफ विवादित बयान देने के बाद कार्रवाई की गई।

चारा घोटाले में लालू यादव का नाम आने के बाद कुछ दिन तो गहमागहमी हुई, लेकिन कुछ दिनों बाद माहौल पूर्ण रूप से इस तरह से शांत हो गया, जैसे हवा का बहाव ही रुक गया हो। शायद यह लालू और उनके परिवार के जीवन में आने वाले तूफान से पहले की शांति थी। चारा घोटाले ने अकेले लालू को ही परेशानी में नहीं डाला, बल्कि पूरे यादव को परेशान कर दिया। कभी सीबीआई कोर्ट में लालू की पेशी हो रही है तो कभी मीसा भारती, इतना ही नहीं तेजस्वी यादव को भी की चुभते सवालों का सामना करना पड़ रहा है। लालू के राजनीतिक करियर का तेज तो अब लगभग खत्म ही हो गया है लेकिन किसी भी मामले में तेजस्वी यादव दोषी होते हैं तो शायद लालू के परिवार का राजनीतिक करियर का अस्त हो सकता है, क्योंकि लालू के नक्शे कदम पर चलकर तेजस्वी ने जनता का भरोसा तो दोबारा जीत लिया लेकिन ज्यादा वक्त तक सत्तासीन नहीं हो सके। राजद और जदयू के बीच तल्खियां किसी भी कारण से आई हों लेकिन खामियाजा तेजस्वी को भुगतना पड़ेगा, इसमें कोई दो राय नहीं है। इसके पीछे तर्क ये है कि पिछले विधानसभा चुनावों में तेजस्वी ने जनता का भरोसा जीता, लेकिन नीतीश के झटका देने के बाद दोबारा तेजस्वी यादव जनता की उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगे, इसका हिसाब तो वक्त करेगा। फिलहाल तेजस्वी के लिए सीबीआई कोर्ट से निर्दोष साबित होना, आग के दरिया से निकलने के बराबर है।

आशु दास

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