दिल्ली से सटे इस क्षेत्र में हुआ था रावण का जन्म, जानिए क्या है पूरा इतिहास

दिल्ली से सटे इस क्षेत्र में हुआ था रावण का जन्म, जानिए क्या है पूरा इतिहास
Updated 13:52 30 Sat Sep 2017
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नई दिल्ली। विजयादशमी पूरे भारत में बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के तौर पर मनाया जा रहा है। मान्यता है कि आज के दिन मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम चन्द्र ने लंकाधिपति रावण का वध कर धर्म की पताका फहराई थी। लेकिन आज भी भारत में एक गांव है और शहर है जो कि रावण के लिए जाना जाता है। इस शहर के इस गांव में आज भी रावण का पुलता नहीं जलाया जाता है। इसके साथ ही यहां पर रामलीला भी नहीं होती है। आईये जानते हैं आखिर ऐसा क्यूं है और कहां है ये गांव।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटा हुआ है नोएडा इसी जिले का हिस्सा है ये गांव जिसका नाम है बिसरख । कहा जाता है कि ये रावण की जन्मभूमि है, रावण के पिता विश्रवा के नाम पर इस गांव का बिसरख पड़ा है। यहां के स्थानीय लोगों की माने तो रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था। लोगों का मानना है कि इस गांव में कभी रावण का दहन नहीं किया जाता है। यहां पर रावण की पूजा होती है, कहा जाता है कि यहां कभी रामलीला का आयोजन पूरा नहीं हो पाया क्योंकि जब भी कोई ऐसा करता है तो किसी ना किसी की गांव में मौत हो जाती है।

लोकजनश्रुति है कि रावण ने बिसरख गांव में जन्म लिया और यहां के शिवमंदिर में तपस्या भी की है। नोएडा के समीप के जिले गाजियाबाद से भी रावण का जुड़ाव रहा है। यहां के हिरण्यगर्भ मंदिर एवं दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर में भी रावण भगवान शिव की तपस्या करने के लिए गया था। इसके साथ ही पड़ोस के जिले मेरठ में रावण की ससुराल है। कहा जाता है कि मंदोदरी मेरठ की रहने वाली थी। मेरठ के कैंट सदर थाने के पास एक ऐसा मंदिर है जो कि रामायण के समकालीन है। मान्यता है कि मयदावन की एक कन्या थी जिसका नाम मैराष्ट्र था वह रोज इसी शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ की आराधना करने के लिए आती थी। उसकी तपस्या और आराधना से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उसे इस संसार के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से शादी करने का वरदान दिया था। इसी मंदिर में एक दिन उसकी मुलाकात लंकाधिपति रावण से हो गई । इसी मंदिर में उन दोनों के बीच प्रेम प्रसंग शुरू हुआ । जो कि इसी मंदिर में विवाह के फलस्वरूप बदल भी गया।

कहा जाता है कि नोएडा के बिसरख गांव का प्राचीन नाम विश्वेश्वरा है। यहां पर त्रेता युग में प्राकृतिक आपदा के बाद ये गांव बिलुप्त हो गया था। पुरातत्ववेत्ताओं ने इस गांव में कई जहां खुदाई भी की है। यहां से कई तरह के शिवलिंग भी प्राप्त हुए हैं। यहां पर प्राप्त शिवलिंग अष्ट भुजाओं वाले हैं, ऐसे शिवलिंग कहीं और प्राप्त नहीं होते हैं। लंकापति रावण की जन्म स्थली होने के कारण यहां के लोग रावण की पूजा करते हैं।

 

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